अक्सर महिलाएं खुद भी अपने शरीर में हो रहे छोटे-छोटे बदलावों को गौर से देखने लगती हैं और उन्हें बच्चे के लिंग से जोड़ने की कोशिश करती हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि अंतिम महीने में दिखने वाले अधिकांश लक्षण शरीर की प्राकृतिक तैयारी होते हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य सुरक्षित डिलीवरी सुनिश्चित करना होता है।

9 महीने की प्रेगनेंसी में लड़का होने के संकेत

गर्भावस्था के नौवें महीने में महिला के शरीर में कई स्पष्ट बदलाव दिखाई देने लगते हैं। इन्हीं बदलावों को देखकर कई लोग यह अनुमान लगाने लगते हैं कि गर्भ में लड़का है। हालांकि ये संकेत अनुभव और मान्यताओं पर आधारित होते हैं, न कि मेडिकल प्रमाण पर।

आम तौर पर बताए जाने वाले संकेत:

  • पेट का आगे की ओर ज्यादा नुकीला दिखना
  • चेहरे पर प्राकृतिक चमक और कम थकान महसूस होना
  • चलने-फिरने में संतुलन बना रहना
  • गर्भावस्था के आखिरी महीने में ऊर्जा का स्तर बेहतर रहना

असल में नौवें महीने में पेट का आकार और शरीर की स्थिति बच्चे की पोजीशन और डिलीवरी की तैयारी से जुड़ी होती है। इस समय बार-बार पेशाब लगना, पेल्विक एरिया में दबाव और हल्का दर्द जैसे लक्षण सामान्य हैं। ऐसे वास्तविक बदलावों को समझने के लिए 9 महीने में डिलीवरी लक्षण पर दी गई जानकारी ज्यादा व्यावहारिक मानी जाती है।

लड़का होने के पारंपरिक लक्षण

लड़का होने के पारंपरिक लक्षण भारतीय समाज में आज भी गहराई से प्रचलित हैं। जैसे गर्भवती महिला को मसालेदार या नमकीन खाने की इच्छा होना, गर्भावस्था में कम थकान महसूस होना या चेहरे पर दाग-धब्बे न दिखना।

ऐसे लक्षणों पर लोग इसलिए भरोसा कर लेते हैं क्योंकि कभी-कभी ये बातें किसी परिचित के अनुभव से मेल खा जाती हैं। लेकिन हर गर्भावस्था अलग होती है। हार्मोनल बदलाव, खान-पान और आराम का स्तर इन लक्षणों को प्रभावित करता है, न कि बच्चे का लिंग।

गर्भ में लड़का होने की मान्यताएं

भारतीय समाज में गर्भावस्था को लेकर कई पुरानी धारणाएं प्रचलित हैं। खासकर नौवें महीने में लोग अलग-अलग मान्यताओं के आधार पर बच्चे के लिंग का अनुमान लगाने लगते हैं, जो अक्सर पीढ़ियों से चली आ रही सोच पर आधारित होती हैं।

प्रचलित मान्यताएं जो अक्सर सुनी जाती हैं:

  • गर्भावस्था में ज्यादा उल्टी न होना
  • मां का मानसिक रूप से मजबूत और शांत रहना
  • वजन का बढ़ना सिर्फ पेट तक सीमित रहना
  • गर्भावस्था का अपेक्षाकृत आसान होना

मेडिकल साइंस के अनुसार ये सभी बातें महिला के हार्मोनल बदलाव, पोषण और मानसिक स्थिति से जुड़ी होती हैं। इनका बच्चे के लिंग से कोई सीधा संबंध नहीं होता। इस समय महिला के लिए सबसे जरूरी होता है अपनी सेहत और सुरक्षा पर ध्यान देना। आखिरी महीने की सही देखभाल के लिए प्रेगनेंसी के 9 महीने की सावधानियां की जानकारी लेना अधिक फायदेमंद रहता है।

लड़का या लड़की पहचानने के घरेलू तरीके

आज भी कई घरों में लड़का या लड़की पहचानने के घरेलू तरीके अपनाए जाते हैं, जैसे धागे में अंगूठी बांधकर पेट के ऊपर घुमाना, गर्भवती महिला के कदमों की चाल से अनुमान लगाना या पेट की ऊंचाई देखकर निष्कर्ष निकालना।

इन तरीकों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और न ही इनसे सही जानकारी मिल सकती है। इन्हें केवल पारंपरिक विश्वास या मनोरंजन तक सीमित रखना ही बेहतर माना जाता है।

अल्ट्रासाउंड से बच्चे का लिंग

मेडिकल साइंस के अनुसार अल्ट्रासाउंड से बच्चे का लिंग पता चल सकता है, लेकिन भारत में यह कानूनी अपराध है। PCPNDT Act के तहत भ्रूण के लिंग की जांच और जानकारी देना सख्त रूप से प्रतिबंधित है।

डॉक्टर अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल सिर्फ बच्चे की ग्रोथ, हार्टबीट, प्लेसेंटा की स्थिति और डिलीवरी से जुड़ी जटिलताओं की पहचान के लिए करते हैं, ताकि समय रहते सही इलाज किया जा सके।

बच्चे के लिंग से जुड़ी मेडिकल सच्चाई

बच्चे के लिंग से जुड़ी मेडिकल सच्चाई पूरी तरह वैज्ञानिक है और इसमें किसी भी तरह के लक्षणों या मान्यताओं की भूमिका नहीं होती। बच्चे का लिंग गर्भधारण के समय ही तय हो जाता है।

महिला के अंडाणु में हमेशा X क्रोमोसोम होता है, जबकि पुरुष के शुक्राणु में X या Y।

  • X + X = लड़की
  • X + Y = लड़का

इसलिए गर्भावस्था के 9वें महीने में दिखने वाले किसी भी शारीरिक बदलाव से बच्चे का लिंग जानना संभव नहीं है।

निष्कर्ष

गर्भावस्था के 9 माह में बच्चा लड़का के लक्षण को लेकर समाज में कई तरह की बातें कही जाती हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर मिथक और पारंपरिक विश्वास हैं। मेडिकल साइंस साफ तौर पर बताती है कि बच्चे का लिंग केवल क्रोमोसोम से तय होता है।

नौवें महीने में महिला के लिए यह जानना ज्यादा जरूरी है कि डिलीवरी कब और कैसे हो सकती है, ताकि वह खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार रख सके। इस विषय पर भरोसेमंद जानकारी के लिए 9 महीने में डिलीवरी कब हो सकती है देखना अधिक लाभकारी होता है।

अंततः, लड़का या लड़की से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है मां और बच्चे दोनों का स्वस्थ और सुरक्षित रहना।