मासिक धर्म चक्र चार मुख्य चरणों में बंटा होता है – मेंस्ट्रुअल फेज, फॉलिक्युलर फेज, ओव्यूलेशन और ल्यूटियल फेज। इन चरणों के दौरान हार्मोन स्तर ऊपर-नीचे होते रहते हैं। इसी उतार-चढ़ाव की वजह से कुछ महिलाओं में बीच चक्र में हल्की ब्लीडिंग हो सकती है। अगर ब्लीडिंग केवल हल्की स्पॉटिंग है और दर्द या कमजोरी जैसे लक्षण नहीं हैं, तो यह अक्सर शरीर का अस्थायी हार्मोनल रिएक्शन हो सकता है।

साथ ही, हर महिला का मासिक चक्र अलग होता है। कुछ महिलाओं में चक्र छोटा होता है, कुछ में लंबा। इसलिए कभी-कभी जो “10 दिन बाद” लग रहा है, वह वास्तव में उनके चक्र के अनुसार ओव्यूलेशन समय भी हो सकता है।

ओव्यूलेशन के समय ब्लीडिंग क्यों होती है

कुछ महिलाओं को ओव्यूलेशन के समय ब्लीडिंग हो सकती है, जो आमतौर पर पीरियड खत्म होने के 8–12 दिन बाद होती है। ओव्यूलेशन के दौरान अंडाशय से अंडा निकलता है। इस समय एस्ट्रोजन हार्मोन में अचानक बदलाव हो सकता है, जिससे हल्की स्पॉटिंग दिख सकती है।

यह ब्लीडिंग आमतौर पर:

  • बहुत हल्की होती है
  • 1–2 दिन में खुद रुक जाती है
  • हल्के पेट दर्द के साथ हो सकती है

कुछ महिलाओं को इस समय एक साइड पेट में हल्का चुभन जैसा दर्द भी महसूस होता है। यह ओव्यूलेशन का सामान्य संकेत हो सकता है और अक्सर किसी उपचार की जरूरत नहीं होती। यदि आपको यह समझने में दिक्कत हो रही है कि सामान्य चक्र में शरीर किन बदलावों से गुजरता है, तो पीरियड आने के संकेत जानना भी मददगार हो सकता है।

अगर हर महीने लगभग एक ही समय पर हल्की स्पॉटिंग होती है और फिर अगला पीरियड समय पर आता है, तो यह ओव्यूलेटरी ब्लीडिंग का संकेत हो सकता है।

बीच चक्र में स्पॉटिंग क्या सामान्य है

बीच चक्र में स्पॉटिंग यानी पीरियड और अगले पीरियड के बीच हल्का खून दिखना। यह कई कारणों से हो सकता है और हमेशा बीमारी का संकेत नहीं होता। किशोरावस्था, डिलीवरी के बाद या पेरिमेनोपॉज़ के समय हार्मोनल बदलाव की वजह से चक्र अस्थिर हो सकता है। इससे बीच में हल्की ब्लीडिंग दिखाई दे सकती है।

तनाव, नींद की कमी और ज्यादा शारीरिक मेहनत भी पीरियड साइकिल को प्रभावित कर सकते हैं। अगर आपका पीरियड फ्लो पहले से बहुत कम हो गया है या चक्र बहुत बदल गया है, तो इससे जुड़े स्वास्थ्य प्रभाव समझने के लिए पीरियड कम आने के नुकसान के बारे में जानना भी जरूरी है।

कभी-कभी सर्विक्स में हल्की सूजन या इन्फेक्शन भी स्पॉटिंग का कारण बन सकता है, खासकर संबंध बनाने के बाद। इसलिए बार-बार होने वाली स्पॉटिंग को सामान्य मानकर अनदेखा न करें।

हार्मोनल बदलाव के लक्षण और अनियमित ब्लीडिंग

महिलाओं के शरीर में हार्मोन बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हार्मोनल बदलाव के लक्षण में अनियमित पीरियड, मूड स्विंग, वजन में बदलाव और बीच-बीच में ब्लीडिंग शामिल हो सकते हैं। थायरॉइड समस्या, पीसीओएस, अत्यधिक तनाव या अचानक वजन बदलना हार्मोन संतुलन बिगाड़ सकते हैं।

जब हार्मोन संतुलित नहीं रहते, तो गर्भाशय की परत समय से पहले झड़ सकती है, जिससे पीरियड के १० दिन बाद ब्लीडिंग आना जैसी स्थिति बन सकती है। नींद की कमी और लंबे समय तक मानसिक तनाव भी शरीर के हार्मोन सिस्टम को प्रभावित करते हैं। इसलिए केवल दवा ही नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल सुधार भी जरूरी होता है।

अगर यह समस्या लंबे समय तक बनी रहे, तो डॉक्टर की सलाह लेकर हार्मोन जांच करवाना जरूरी हो जाता है।

गर्भनिरोधक गोलियों का असर

जो महिलाएँ गर्भनिरोधक गोलियाँ लेती हैं, उनमें गर्भनिरोधक गोलियों का असर भी बीच चक्र में ब्लीडिंग के रूप में दिख सकता है।

खासकर:

  • गोली शुरू करने के शुरुआती महीनों में
  • गोली लेना भूल जाने पर
  • दवा बदलने पर

इसे ब्रेकथ्रू ब्लीडिंग कहा जाता है। यह आमतौर पर हल्की होती है और शरीर के नए हार्मोन स्तर से एडजस्ट होने पर ठीक हो जाती है। अगर गोली नियमित समय पर न ली जाए तो ब्लीडिंग की संभावना बढ़ जाती है।

कुछ महिलाएँ यह भी पूछती हैं कि क्या पीरियड के दौरान संबंध बनाने से साइकिल पर असर पड़ सकता है इस विषय में सही जानकारी के लिए पीरियड में संबंध बनाने के नुकसान पढ़ना उपयोगी हो सकता है। यदि लगातार अनियमित ब्लीडिंग हो रही है, तो डॉक्टर दवा की मात्रा या प्रकार बदल सकते हैं।

गर्भाशय से असामान्य रक्तस्राव कब माना जाता है

अगर ब्लीडिंग बार-बार हो, ज्यादा मात्रा में हो या लंबे समय तक चलती रहे, तो इसे गर्भाशय से असामान्य रक्तस्राव माना जा सकता है।

इसके पीछे कारण हो सकते हैं:

  • फाइब्रॉइड
  • पॉलिप्स
  • संक्रमण
  • एंडोमेट्रियोसिस
  • हार्मोन असंतुलन

40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में इस तरह की ब्लीडिंग को और अधिक गंभीरता से जांचा जाता है। लंबे समय तक असामान्य ब्लीडिंग रहने से शरीर में खून की कमी हो सकती है, जिससे थकान, चक्कर और कमजोरी महसूस हो सकती है। ऐसी ब्लीडिंग को नजरअंदाज करने से समस्या बढ़ सकती है, इसलिए समय पर अल्ट्रासाउंड या अन्य जांच कराना जरूरी है।

कब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है

हालांकि हर बार पीरियड के १० दिन बाद ब्लीडिंग आना गंभीर नहीं होता, लेकिन इन स्थितियों में डॉक्टर से जरूर मिलें:

  • ब्लीडिंग बहुत ज्यादा हो
  • हर महीने बीच में ब्लीडिंग हो
  • तेज पेट दर्द या चक्कर आए
  • बदबूदार डिस्चार्ज हो
  • कमजोरी या थकान महसूस हो

अगर ब्लीडिंग के साथ बुखार या तेज दर्द है, तो यह संक्रमण का संकेत भी हो सकता है। समय पर जांच कराने से बड़ी समस्या से बचा जा सकता है और मन की चिंता भी कम होती है। डॉक्टर आपकी मेडिकल हिस्ट्री, दवाओं और हार्मोन स्थिति को ध्यान में रखकर सही उपचार बताते हैं।

निष्कर्ष

पीरियड के १० दिन बाद ब्लीडिंग आना कई बार सामान्य हार्मोनल बदलाव, ओव्यूलेशन या गर्भनिरोधक दवाओं के कारण हो सकता है। लेकिन बार-बार या ज्यादा ब्लीडिंग होने पर इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।

मासिक चक्र का रिकॉर्ड रखना, लक्षणों पर ध्यान देना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेना महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। जागरूक रहना, सही जानकारी रखना और समय पर जांच कराना यही बेहतर प्रजनन स्वास्थ्य की कुंजी है।