लेकिन इसी समय अगर 4 महीने की प्रेगनेंसी में ब्लीडिंग होना दिखाई दे, तो यह स्वाभाविक रूप से चिंता और डर पैदा करता है। गर्भावस्था में किसी भी तरह की ब्लीडिंग को हल्के में नहीं लेना चाहिए, चाहे वह कितनी ही कम क्यों न हो। ब्लीडिंग का रंग (हल्का गुलाबी, भूरा या गहरा लाल), मात्रा और कितनी देर तक रहती है ये सभी बातें यह समझने में मदद करती हैं कि स्थिति सामान्य है या गंभीर। कई बार मानसिक तनाव, ज्यादा थकान या हार्मोनल उतार-चढ़ाव भी हल्की स्पॉटिंग का कारण बन सकते हैं, लेकिन सही वजह जानना बेहद जरूरी होता है।
दूसरी तिमाही में ब्लीडिंग के कारण
दूसरी तिमाही में शरीर तेजी से बदलता है और गर्भाशय का आकार बढ़ने लगता है। इसी दौरान कई आंतरिक और बाहरी कारण ब्लीडिंग की वजह बन सकते हैं, जो हर महिला में अलग-अलग हो सकते हैं।
मुख्य कारण हो सकते हैं:
- हार्मोनल बदलाव और सर्विक्स की संवेदनशीलता
- ज्यादा चलना, भारी काम या अचानक झटका लगना
- पहले के महीनों में ब्लीडिंग का इतिहास, जैसे ३ महीने की प्रेगनेंसी में ब्लीडिंग होना
- योनि या यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन
इन कारणों में से कुछ सामान्य हो सकते हैं, लेकिन अगर ब्लीडिंग बार-बार हो या बढ़ती जाए, तो इसे हल्के में लेना सही नहीं होता।
प्रेगनेंसी में ब्लीडिंग कितना खतरनाक है
अक्सर गर्भवती महिलाओं के मन में यह सवाल रहता है कि प्रेगनेंसी में ब्लीडिंग कितना खतरनाक है। इसका जवाब ब्लीडिंग की स्थिति पर निर्भर करता है।
अगर ब्लीडिंग हल्की है, कुछ समय में खुद ही रुक जाती है और इसके साथ कोई दर्द या कमजोरी नहीं है, तो कई बार यह गंभीर समस्या नहीं होती। लेकिन अगर ब्लीडिंग बार-बार हो, खून की मात्रा ज्यादा हो या इसके साथ चक्कर, घबराहट और थकान महसूस हो, तो यह खतरे का संकेत हो सकता है।
कुछ महिलाओं में यौन संबंध के बाद भी ब्लीडिंग देखी जाती है, जिसे सेक्स के बाद ब्लीडिंग होना कहा जाता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर को जानकारी देना जरूरी होता है, ताकि सर्विक्स या प्लेसेंटा से जुड़ी किसी समस्या को समय रहते पहचाना जा सके।
प्लेसेंटा से जुड़ी समस्याएँ
चौथे महीने में ब्लीडिंग का एक अहम कारण प्लेसेंटा से जुड़ी समस्याएँ हो सकती हैं। प्लेसेंटा मां और बच्चे के बीच पोषण और ऑक्सीजन का मुख्य माध्यम होता है, इसलिए इसमें गड़बड़ी होने पर स्थिति गंभीर हो सकती है।
प्लेसेंटा प्रीविया में प्लेसेंटा गर्भाशय के निचले हिस्से में स्थित हो जाता है, जिससे अचानक या बार-बार ब्लीडिंग हो सकती है। वहीं प्लेसेंटल एब्रप्शन की स्थिति में प्लेसेंटा गर्भाशय की दीवार से आंशिक रूप से अलग हो जाता है, जिससे तेज दर्द और ज्यादा ब्लीडिंग हो सकती है। इन दोनों ही स्थितियों में डॉक्टर की नियमित निगरानी, अल्ट्रासाउंड और पूरी सावधानी जरूरी होती है, ताकि मां और बच्चे दोनों को सुरक्षित रखा जा सके।
ब्लीडिंग और पेट दर्द का संबंध
अगर ब्लीडिंग और पेट दर्द का संबंध एक साथ दिखाई दे, तो यह स्थिति ज्यादा गंभीर मानी जाती है। हल्का खिंचाव या दबाव सामान्य हो सकता है, क्योंकि गर्भ बढ़ने से मांसपेशियां फैलती हैं।
लेकिन अगर दर्द तेज, लगातार या ऐंठन जैसा हो और उसके साथ ब्लीडिंग भी हो, तो यह गर्भाशय में संकुचन या किसी अंदरूनी समस्या का संकेत हो सकता है। कई बार महिलाओं को बिना पीरियड के भी ब्लीडिंग दिखाई देती है, जिसे बिना पीरियड के ब्लीडिंग होना कहा जाता है। ऐसी स्थिति में खुद से अनुमान लगाने के बजाय तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना सबसे सुरक्षित विकल्प होता है।
ब्लीडिंग होने पर क्या सावधानियाँ रखें
गर्भावस्था के चौथे महीने में ब्लीडिंग होने पर सही सावधानियाँ अपनाने से स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता है। इस समय शरीर को पूरा आराम और अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है।
जरूरी सावधानियाँ:
- पूरी तरह बेड रेस्ट लेना
- भारी सामान उठाने और लंबी यात्रा से बचना
- पर्याप्त पानी और हल्का, पौष्टिक भोजन लेना
- बिना डॉक्टर की सलाह के कोई दवा न लेना
इन सावधानियों के साथ-साथ शरीर के संकेतों पर नजर रखना जरूरी होता है। अगर ब्लीडिंग दोबारा शुरू हो या बढ़े, तो देरी किए बिना डॉक्टर से मिलना चाहिए।
डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए
यह समझना बहुत जरूरी है कि डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए, क्योंकि समय पर इलाज कई जटिलताओं को रोक सकता है। अगर ब्लीडिंग ज्यादा हो, लंबे समय तक रुक न रही हो, पेट या कमर में तेज दर्द हो, बुखार आए, या चक्कर और कमजोरी महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
इसके अलावा अगर पहले से हाई-रिस्क प्रेगनेंसी हो, ब्लड प्रेशर या शुगर की समस्या हो, या पहले गर्भपात का इतिहास रहा हो, तो हल्की ब्लीडिंग में भी देरी नहीं करनी चाहिए।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, 4 महीने की प्रेगनेंसी में ब्लीडिंग होना डरावना जरूर लग सकता है, लेकिन हर स्थिति खतरनाक नहीं होती। सही जानकारी, समय पर सावधानी और डॉक्टर की सलाह से अधिकतर मामलों में गर्भ को सुरक्षित रखा जा सकता है।
गर्भावस्था के इस महत्वपूर्ण दौर में अपने शरीर के संकेतों को समझना, मानसिक शांति बनाए रखना और नियमित जांच कराना ही मां और बच्चे दोनों की सुरक्षा का सबसे अच्छा तरीका है।


