कई महिलाओं और कपल्स के मन में यह सवाल आता है कि पीरियड में प्रेगनेंसी हो सकती है या नहीं। आम धारणा यह है कि पीरियड के दिनों में संबंध बनाने से गर्भधारण संभव नहीं होता, लेकिन हकीकत थोड़ी अलग हो सकती है। हर महिला की बॉडी, हार्मोनल साइकिल और ओव्यूलेशन टाइम अलग होता है, इसलिए रिस्क पूरी तरह शून्य नहीं माना जाता। कई बार गलत जानकारी या सुनी-सुनाई बातों के कारण लोग पीरियड को पूरी तरह “सेफ टाइम” मान लेते हैं, जो सही नहीं है। सही प्रजनन जानकारी न होने से अनचाही प्रेगनेंसी का खतरा बढ़ सकता है।
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प्रेगनेंसी में डाइट का सीधा असर मां और शिशु दोनों की सेहत पर पड़ता है। ऐसे में फल खाना फायदेमंद माना जाता है, लेकिन कई महिलाओं के मन में सवाल होता है कि प्रेगनेंसी में केला खाना सही है या नहीं। केला पोषक तत्वों से भरपूर होता है, लेकिन कुछ स्थितियों में इसके नुकसान भी हो सकते हैं। केला आसानी से उपलब्ध और सस्ता फल है, इसलिए कई गर्भवती महिलाएं इसे रोजाना डाइट में शामिल करती हैं। हालांकि, हर शरीर की जरूरत अलग होती है, इसलिए इसकी सही मात्रा जानना जरूरी है।
पीरियड के १० दिन बाद ब्लीडिंग आना कई महिलाओं के लिए चिंता का कारण बन सकता है। सामान्य मासिक चक्र लगभग 21–35 दिनों का होता है, इसलिए बीच में दोबारा ब्लीडिंग होना अक्सर असामान्य लगता है। लेकिन हर बार यह गंभीर समस्या नहीं होती। कई बार यह शरीर में हो रहे प्राकृतिक बदलावों का संकेत होता है। फिर भी, कारण समझना जरूरी है ताकि सही समय पर सही कदम उठाया जा जा सके।
दिव्य गर्भ संस्कार विज्ञान
The 9th month of pregnancy is the final stage of your journey before meeting your little one. This month is crucial as the baby is preparing for birth, and the mother’s body goes through significant changes. Understanding what to expect can help you feel more prepared, reduce anxiety, and ensure a smoother delivery.
आज के समय में महिलाओं की बदलती जीवनशैली, खानपान और तनाव के कारण हार्मोनल समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। इन्हीं समस्याओं में से एक है PCOD (Polycystic Ovarian Disease)। यह समस्या न सिर्फ पीरियड्स को प्रभावित करती है, बल्कि वजन बढ़ने, स्किन प्रॉब्लम्स, मानसिक स्वास्थ्य और गर्भधारण पर भी गहरा असर डाल सकती है।
गर्भावस्था के दौरान ब्लीडिंग होना किसी भी महिला के लिए मानसिक तनाव और डर पैदा कर सकता है। प्रेगनेंसी को आमतौर पर खुशी और उम्मीदों से भरा समय माना जाता है, लेकिन जब इस दौरान अचानक खून दिखाई देता है, तो चिंता होना स्वाभाविक है। कई महिलाओं को लगता है कि ब्लीडिंग का मतलब तुरंत कोई गंभीर समस्या है, जबकि वास्तव में हर स्थिति खतरनाक नहीं होती।
Periods can bring discomfort, cramps, bloating, fatigue, and mood swings. While painkillers offer temporary relief, your daily diet plays a powerful role in easing menstrual symptoms naturally. Knowing what to eat during periods can help reduce pain, improve energy levels, and support hormonal balance.
The 1st trimester pregnancy is the most critical and sensitive stage of pregnancy, as it lays the foundation for the baby’s growth and overall health. This phase lasts from week 1 to week 12 and involves rapid hormonal changes that help the body adjust to pregnancy. Although the baby is still tiny, essential organs and body systems begin forming during this time.
White discharge during pregnancy is one of the most common physical changes women experience after conception. For many expecting mothers, noticing an increase in vaginal discharge can feel uncomfortable, surprising, or even stressful especially if it appears suddenly. However, in most cases, this change is a completely natural response to pregnancy-related hormonal shifts and increased blood flow in the pelvic region.
सी सेक्शन डिलीवरी के बाद शरीर को पूरी तरह ठीक होने में समय लगता है। इस दौरान कई महिलाओं की सबसे बड़ी चिंता होती है – c section delivery ke baad pet kaise kam kare। पेट पर जमा फैट, ढीली स्किन और कमजोरी सामान्य हैं, लेकिन सही देखभाल, डाइट और हल्की एक्सरसाइज से इसे सुरक्षित तरीके से कम किया जा सकता है।

