कई कपल्स के लिए बार-बार कोशिश करने के बाद भी गर्भधारण न होना मानसिक और भावनात्मक रूप से काफी परेशान करने वाला हो सकता है। ऐसी स्थिति में सही समय पर जांच करवाना बेहद जरूरी हो जाता है, ताकि समस्या की जड़ को समझकर सही इलाज शुरू किया जा सके।
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दिव्य गर्भ संस्कार विज्ञान
वैवाहिक जीवन में अक्सर यह सवाल उठता है कि महीने में कितनी बार करना चाहिए ताकि संबंध मजबूत और स्वस्थ बने रहें। पति-पत्नी दोनों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए सही आवृत्ति जानना बहुत जरूरी है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि शारीरिक संबंध केवल भावनात्मक जुड़ाव नहीं, बल्कि स्वस्थ दांपत्य जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है।
डिलीवरी के बाद महिला के शरीर को सामान्य अवस्था में लौटने में समय लगता है। इस दौरान शरीर से खून की कमी, थकान, हार्मोनल बदलाव और कमजोरी जैसी समस्याएँ सामने आती हैं। ऐसे समय पर सही खान-पान और सही आदतें शरीर को जल्दी स्वस्थ बनाने में मदद करती हैं। पानी सबसे जरूरी तत्वों में से एक है, इसलिए उसका तापमान भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है।
महिलाओं में सफेद पानी (श्वेत प्रदर या ल्यूकोरिया) आना एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है, जो प्राइवेट पार्ट की सफाई और सुरक्षा के लिए होता है। यह हल्का सफेद, पतला और बिना बदबू वाला होता है। सामान्य सफेद पानी शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करता है और संक्रमण को रोकता है। यह हर महिला में मात्रा और रूप के हिसाब से अलग हो सकता है।
गर्भावस्था के दौरान बैठने का सही तरीका अपनाना बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इस समय शरीर में तेजी से बदलाव होते हैं। जैसे-जैसे पेट बढ़ता है, शरीर का संतुलन बदलता है और कई बार साधारण-सी बैठने की मुद्रा भी कमर दर्द, थकान, पेट में खिंचाव और पैरों में सूजन का कारण बन जाती है। इसलिए इस बात को समझना ज़रूरी है कि प्रेगनेंसी में कैसे बैठना चाहिए ताकि आपका शरीर सुरक्षित रहे और गर्भस्थ शिशु पर कोई अनावश्यक दबाव न पड़े।
प्रेगनेंसी के शुरुआती दिन बेहद संवेदनशील होते हैं। इस समय भ्रूण का विकास तेज़ी से होता है और माँ के शरीर में हार्मोनल बदलाव तेजी से होते हैं। इसलिए हर महिला को यह समझना जरूरी है कि प्रेगनेंसी में क्या नहीं खाएँ और किन चीज़ों से दूरी बनाए रखना सुरक्षित है। सही खान-पान माँ और बच्चे दोनों के लिए लाभकारी होता है और शुरुआती महीनों में किसी भी तरह के जोखिम को कम करता है।
प्रेगनेंसी की शुरुआत में ज्यादातर महिलाओं को उल्टी, जी मचलाना या मॉर्निंग सिकनेस की समस्या होती है। यह एक सामान्य स्थिति है, लेकिन कभी-कभी यह रोज़मर्रा की activities को प्रभावित कर देती है। ऐसे में कई प्रेगनेंसी में उल्टी रोकने के घरेलू उपाय राहत देने में काफी कारगर साबित होते हैं। इस ब्लॉग में हम आसान, सुरक्षित और प्राकृतिक नुस्खों के साथ-साथ जरूरी सावधानियों के बारे में भी जानेंगे।
डिलीवरी के बाद लगभग हर नई माँ के मन में यह सवाल ज़रूर आता है कि डिलीवरी के कितने दिन बाद पेट कम होता है। प्रेगनेंसी के दौरान शरीर में कई हार्मोनल बदलाव होते हैं, बच्चेदानी (uterus) का फैलाव बढ़ता है और वज़न में भी बढ़ोतरी होती है। यही कारण है कि बच्चा होने के बाद पेट तुरंत कम नहीं होता। पेट को अपनी सामान्य स्थिति में वापस आने में समय, सही डायट, नियमित व्यायाम और शरीर की देखभाल की ज़रूरत होती है। कई महिलाएँ इस दौरान भावनात्मक रूप से भी बदलाव महसूस करती हैं, इसलिए मानसिक स्वास्थ्य और आराम का भी उतना ही महत्व है।

