कई महिलाओं और कपल्स के मन में यह सवाल आता है कि पीरियड में प्रेगनेंसी हो सकती है या नहीं। आम धारणा यह है कि पीरियड के दिनों में संबंध बनाने से गर्भधारण संभव नहीं होता, लेकिन हकीकत थोड़ी अलग हो सकती है। हर महिला की बॉडी, हार्मोनल साइकिल और ओव्यूलेशन टाइम अलग होता है, इसलिए रिस्क पूरी तरह शून्य नहीं माना जाता। कई बार गलत जानकारी या सुनी-सुनाई बातों के कारण लोग पीरियड को पूरी तरह “सेफ टाइम” मान लेते हैं, जो सही नहीं है। सही प्रजनन जानकारी न होने से अनचाही प्रेगनेंसी का खतरा बढ़ सकता है।
-
गर्भावस्था
-
गर्भावस्था के चरण
-
गर्भावस्था के लक्षण और बदलाव
-
गर्भावस्था में आहार और पोषण
-
गर्भावस्था में जीवनशैली और देखभाल
-
गर्भावस्था में स्वास्थ्य समस्याएं और उसकी देखभाल
-
गर्भावस्था में आयुर्वेद और घरेलू उपाय
-
प्रसव के बाद की देखभाल
-
पीसीओएस
-
पीसीओडी
-
पीरियड्स
-
प्रेगनेंसी डिलीवरी डेट कैलकुलेटर
-
प्रेगनेंसी के लक्षण
-
सेक्स
-
गर्भधारण की तैयारी
-
गर्भावस्था में सेक्स और संबंध
-
बच्चे का विकास और प्रसव
-
गर्भावस्था से जुड़े मिथक और सच्चाई
-
पीरियड्स और हार्मोनल असंतुलन
-
अंडाशय की गुणवत्ता कैसे सुधारें?
-
पीसीओएस और पीसीओडी के लिए आहार और उपचार
प्रेगनेंसी में डाइट का सीधा असर मां और शिशु दोनों की सेहत पर पड़ता है। ऐसे में फल खाना फायदेमंद माना जाता है, लेकिन कई महिलाओं के मन में सवाल होता है कि प्रेगनेंसी में केला खाना सही है या नहीं। केला पोषक तत्वों से भरपूर होता है, लेकिन कुछ स्थितियों में इसके नुकसान भी हो सकते हैं। केला आसानी से उपलब्ध और सस्ता फल है, इसलिए कई गर्भवती महिलाएं इसे रोजाना डाइट में शामिल करती हैं। हालांकि, हर शरीर की जरूरत अलग होती है, इसलिए इसकी सही मात्रा जानना जरूरी है।
पीरियड के १० दिन बाद ब्लीडिंग आना कई महिलाओं के लिए चिंता का कारण बन सकता है। सामान्य मासिक चक्र लगभग 21–35 दिनों का होता है, इसलिए बीच में दोबारा ब्लीडिंग होना अक्सर असामान्य लगता है। लेकिन हर बार यह गंभीर समस्या नहीं होती। कई बार यह शरीर में हो रहे प्राकृतिक बदलावों का संकेत होता है। फिर भी, कारण समझना जरूरी है ताकि सही समय पर सही कदम उठाया जा जा सके।
दिव्य गर्भ संस्कार विज्ञान
गर्भावस्था का नौवां महीना किसी भी महिला के जीवन का सबसे निर्णायक समय होता है। इस चरण में डिलीवरी कभी भी हो सकती है, इसलिए शरीर और मन दोनों पूरी तरह से बदलाव के दौर से गुजरते हैं। ऐसे समय में परिवार और आसपास के लोग अलग-अलग अनुभव साझा करने लगते हैं, जिससे गर्भावस्था के 9 माह में बच्चा लड़का के लक्षण जानने की उत्सुकता और बढ़ जाती है।
प्रेगनेंसी की शुरुआत होते ही कई महिलाओं को मतली और उल्टी की समस्या होने लगती है। यह स्थिति अक्सर नई मांओं को परेशान कर देती है और उनके मन में सबसे आम सवाल उठता है – प्रेगनेंसी में उल्टी कितने महीने तक होती है? इसे आम भाषा में मॉर्निंग सिकनेस कहा जाता है, हालांकि यह केवल सुबह ही नहीं बल्कि दिन के किसी भी समय हो सकती है।
प्रेगनेंसी का तीसरा महीना गर्भावस्था का एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण चरण होता है। इस समय भ्रूण तेजी से विकसित होने लगता है और मां के शरीर में भी कई शारीरिक व हार्मोनल बदलाव होते हैं। ऐसे में ज्यादातर महिलाओं के मन में यह सवाल आता है कि 3 month pregnancy me kya khana chahiye, ताकि बच्चे का विकास सही तरीके से हो और मां खुद को स्वस्थ महसूस कर सके।
सिजेरियन डिलीवरी (C-Section) के बाद महिलाओं के शरीर में कई शारीरिक और हार्मोनल बदलाव होते हैं। ऐसे में बहुत-सी महिलाओं के मन में यह सवाल आता है कि सिजेरियन डिलीवरी के कितने दिन बाद पीरियड आता है और क्या यह सामान्य है या नहीं। खासकर पहली बार मां बनी महिलाओं के लिए यह जानना जरूरी होता है कि डिलीवरी के बाद पीरियड कब शुरू होंगे और उनमें क्या बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
जब किसी महिला को अचानक यह पता चलता है कि वह गर्भवती है और यह गर्भ उसकी योजना में नहीं था, तो मानसिक तनाव, डर और उलझन होना बिल्कुल सामान्य है। खासकर पहले महीने में महिलाएं जल्दी समाधान चाहती हैं और इसी वजह से वे इंटरनेट पर एक महीने की प्रेगनेंसी कैसे हटाए घरेलू उपाय जैसे सवाल खोजने लगती हैं। कई बार सामाजिक दबाव, रिश्तों की चिंता या आर्थिक स्थिति महिला को और ज्यादा तनाव में डाल देती है।
प्रेगनेंसी का पहला तिमाही यानी 1 से 3 महीना महिला के जीवन का बहुत ही नाजुक और महत्वपूर्ण समय होता है। इस दौरान शरीर के अंदर तेजी से हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिसकी वजह से थकान, उल्टी, मतली, सिर दर्द और कमजोरी महसूस होना आम बात है। कई महिलाओं को सुबह के समय ज्यादा परेशानी होती है, जिसे मॉर्निंग सिकनेस कहा जाता है।

